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मंगलवार, 29 जुलाई 2008

उत्तरदायित्व

कभी रोते कभी हँसते
रुकते कभी चलते
उठते कभी गिरते
निभाया था
क्या मालूम था
कि इस तरह
जीवन डगर में एक और चीज है
हल्का कभी भारी सा
उठाना पड़ता है
सभी को
आलावा इसके नही कोई रास्ता
तभी तो जीने के लिए
कुछ पाने के लिए
गले लगना पड़ता है
कभी निराश करता
कभी सुफल बरसाता
एक चीज ये भी है
जिसने स्वीकारा
वो पार पाया
करना नही कभी इंकार
तुझको मेरी कसम है
बेशक
छूटता है पसीना
मगर यही है जीना
उठा लो सोच कर कि
एक ही तो लफ्ज है बस ये
उत्तरदायित्व।

-बौबी बावरा

बुधवार, 23 जुलाई 2008

सरकार की मंगलवार

लो बच गई है अब सरकार मेरे यार
विकासवादियों की हुई जीत धमाकेदार
हाँ या ना का ये दंगल था बड़ा मजेदार
खास बड़ा था सरकार के लिए दिन मंगलवार

मतान्धता के नशे में वे होकर चूर
कुर्सी पर नजर गड़ाये पजाते हुए खुर
नकली सींगों में मलकर अहंकारी सुरूर
टकराकर ऐसे लुढ़के के अब उठने से मजबूर

रिश्वत का इल्जाम लगाया धोती गीली होती देख
हर फार्मूला पैंतरा आजमाया पलट पलट पासा फेंक
अपना ही तमाशा बनाया अवसरवादिता की रोटी सेक
लटक गए मुंह सबके सामने अपनी हार होती देख

खिंसियानी बिल्ली जायेगी कहाँ खम्भा नोचने
वजह अपनी हार का सरकार पर थोपने
आते रहेंगे सोच सोच कर फ़िर से भौंकने
अमेरिका से एटमी डील को होने से रोकने

ये विरोधी हैं अपने ही लक्ष्य से भटके
बौराए अपने ही विचारधारा में अटके
ना ख़ुद बढ़ेंगे ना बढ़ने देंगे हवा में हैं लटके
बदलती अर्थव्यवस्था से कब तक रहेंगे कटके

जनता बुद्धिमान ना सही पर बुद्धू भी नहीं
एटमी डील का कखहरा भले जानते नहीं
पर इतना पता है की सरकार इतनी मुरख नहीं
गरीबी भुखमरी के आगे डील इतना बुरा नहीं

परमाणु शक्ति से उर्जा लेना सीखना होगा
मानसून आधारित कृषि को इससे सींचना होगा
कृषि क्रान्ति से गरीबी को जीतना होगा
विश्व पटल पर भारत का नाम लिखना ही होगा.

-बौबी बावरा

मंगलवार, 22 जुलाई 2008

भारतीय संसद के पहलवान

घुमावदार संसद के ख्म्भेदार भवन में
जमा हो लिए अपने मुद्दों का लेकर गट्ठर
उजले पोशाक धरकर अपने तन बदन में
दुसरे का मट्टका फोड़ने करने दुसरे का पंचर

छोटी बड़ी समस्याओं की लिस्ट तैयार होती है
पर नहीं सुनने की जैसे खा रखी सबने क़समें
थकी बुझी प्रतिनिधित्व इस कोलाहल में सोती है
भारतीय लोकतंत्र की ये अतिगारिमापूर्ण हैं रश्में

उठा पटक बांह मरोड़ हाथापाई से होती कसरत है
फुल वोलुम विरोध रागालाप से साफ़ होती है गला
देशहित सम्बन्धी बातों से इन प्राणियों को नफरत है
भारतीय राजनीति करने की ये अनूठी है कला

मुद्दा पटल पर रखने का वक्त बड़ा कम है
देखते देखते भोजनावकाश लो थाम लो अपनी थाली
बहसबाजी का गेम है खाने में असली दम है
सोचो राजनीति होगी कैसे पेट जब हो खाली

भूखी मुरख जनता तो भूखे पेट सो लेती है
ये उनके नेता हैं हाजमा इनका है फाइव स्टार
गर्मी बरसात सर्दी में जनता सड़क पर होती है
और इनके नेता के पास आठ हैं एसीयुक्त कार

और कितना फूंकेंगे पैसा सदन का करके बहिष्कार
वेतन भत्ता बनाकर कराके अपना ही सत्कार
दुसरे को पटक पछाड़कर जैसे हो गैंगवार
षडयंत्र प्रपंचयुक्त पॉवर का उभरता ये कारोबार।

-बौबी बावरा

सोमवार, 21 जुलाई 2008

मंगरू का विचार संसार

मंगरू झाड़ी के अंदर शौच पर बैठा था
बगल में रखा पानी भरा लोटा था
दो बीड़ी फूंक चुका पर काम न बना
घरवाली को मना किया ऐसे पकवान न बना
खैर झाड़ी के अंदर था सुकून का समंदर
दुनिया से अलग एक अभेद्ध पुरंदर
बैठा हो जैसा किसी टाइम मशीन पर
विचारों ने शुरु की कुश्ती दिमागी जमीन पर
जीवंत मुद्दा पर विचारों के पंछी लगे पंख फरफराने
एटमी उर्जा से बिदके विरोधी हाथी लगे चिघाड़ने
एटमी करार या कोई है महा तकरार
तिनके तिनके को तरसे मनमोहन सरकार
अमेरिका नाम सुनते ही लेफ्टी भुत सरके
नही चाहिए उन्हें एटमी उर्जा नाचेंगे ढिबरी धरके
एक एक मत पाने को हो गया घमासान
कमाई का एक रास्ता मिल गया आसान
छुपके थोड़ा रूठे रहो रेट बढ़ जाएगा
पचीस करोड़ से आगे वेट बढ़ जाएगा
मज़बूरी सरकार बचाने की खर्च तो होगा ही
जनता की कटेगी जेब तब दर्द तो होगा ही
धनकुबेरों के पैसे मत खरीदने में लगेंगे
पदों के मोल मलाई के मेले भी लगेंगे
दागियों को मौका है अपना पाप ढकने का
सरकार के समर्थन में अपना मत रखने का
कैसे दिन देख रही सरकार ये बेचारी
कैदियों और आरोपियों से दोस्ती की लाचारी
लेफ्टी और विरोधियों से क्या मगजमारी
काली भैंस को बीन की धुन लगे कैसे प्यारी
कैसे कैसे बैल जोते तुमने देश के बैलगाडी में
सड़क पर एक बैल चले तो दुसरा खींचे झाड़ी में
झाड़ी में तो मंगरू भी बैठा है जानकर मंगरू ठिठका
विचारों का घोड़ा हिनहिनाकर अब यहाँ पर अटका
शौच शौच में सोच विचार मुफ्त में दुनिया दर्शन
जो चाहो जैसा चाहो खूब करो ख्याली मर्दन।

-बौबी बावरा




रविवार, 20 जुलाई 2008

भारत अमेरिकी परमाणु करार

भारत अमेरिकी परमाणु करार
अपने ही देश में सौ तकरार
UPA के कन्धों में देश का भार
UPA चाहे हो देश का उद्धार
गांवो में पहुंचे बिजली एक बार
बंजर खेतों में पड़े पानी की फुहार
कोयला तेल का है सीमित भंडार
भविष्य का सोचना है दरकार
तभी होगा समूचे देश का सुधार
वामपंथी विपक्षी कब होंगे समझदार
क्या वे चाहते अर्थव्यवस्था की हार
अपने जिद्द में गिराने को सरकार
करते फ़िर रहे हैं क्यों दुष्प्रचार
साकारात्मकता को करके आस्विकार
है क्या इनके पास चमत्कार
उर्जा की मांग का कोई उपचार
विकास के हैं क्या युक्तियाँ चार
जनता पर पड़ी जब महंगाई की मार
जब काट रही है तेल की धार
अब सीख लो करना भी एतबार
अलग राग छोड़ मिलाओ तार से तार
फ़िर से सोचकर देखो यार
विनाश नहीं है ये मानवता की दरबार
पुरानी सोच छोड़ अब करो विचार
देश को करो न और लाचार
आर्थिंक विकास का ये है आधार
क्या करोगे पाकर एटमी हथियार
इससे पिछड़ जाओगे होके बीमार
और मत करो देश का बंटाधार
करो न देशहित को दरकिनार
सोचो इसके हैं लाभ अपार
विकास के इसमे नुस्खे हजार
सरकार गिराकर क्या दोगे समाचार
कर पाओगे क्या शेर का शिकार
चलो रहने दो सुनो आत्मा की पुकार
विकास को लेने दो एक नया आकार
पीढियां देगी तुमको पुरस्कार।

-बौबी बावरा